वंदना गुप्ता (शोध छात्रा)
इतिहास विभाग
गाँधी –फैज़ –ए –आम कॉलेज शाहजहांपुर
(महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विवि बरेली
डॉ समन जेहरा जैदी(अस्सिस्टेंट प्रोफेसर)
इतिहास विभाग
गाँधी-फैज़-ए-आम कॉलेज शाहजहा
(महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विवि बरेली)
सारांश
प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक रुहेलखंड क्षेत्र में जिसमें अन्य जनपद जैसे बरेली, रामपुर, उधमसिंह नगर, अमरोहा, शाहजहांपुर, बदायूं, पीलीभीत, रामपुर आदि सभी आते हैं में बहुत ही महत्वपूर्ण स्मारक एवं इमारतो का निर्माण किया गया जो आज भी दर्शनीय है तथा पर्यटन एवं अन्य कार्यों के लिए जाने जाते है| वही ब्रिटिश काल में रुहेलखंड में विभिन्न इमारते गोथिक शैली में बनाई गई जो अंग्रेजों के द्वारा अपनी सुविधाओं के लिए बनवाई गई थी जिसमें नहर कोठियां, चर्च, स्कूल, अस्पताल, प्रशासनिक भवन, न्यायालय एवं अन्य भवन बनवाए गए थे | इस शोध पत्र में ब्रिटिश शासन में निर्मित रुहेलखंड के स्मारकों का विस्तृत विश्लेषण किया गया है |
मुख्य शब्द- गोथिक शैली,चर्च, अस्पताल, प्रशासनिक भवन
इज्जतनगर नहर निरीक्षण कोठी – नहरों की नियमित देखरेख, जल वितरण तथा निरीक्षण के उद्देश्य से यहाँ नहर निरीक्षण कोठी (Inspection Bungalow) का निर्माण कराया गया। यह भवन सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता, सहायक अभियंता तथा अन्य अधिकारियों के भ्रमण एवं निरीक्षण के लिए उपयोग में लाया जाता था। कोठी का निर्माण ब्रिटिश सार्वजनिक निर्माण विभाग और सिंचाई विभाग के मानकों के अनुसार हुआ था। भवन में ऊँचे बरामदे, मोटी ईंट की दीवारें, ढलानदार छत, विश्राम कक्ष, कार्यालय कक्ष तथा अभिलेख रखने के लिए अलग कमरा बनाया गया था। इसके आसपास घोड़ों और बैलगाड़ियों के ठहरने की व्यवस्था भी रहती थी, क्योंकि उस समय अधिकारी इन्हीं साधनों से निरीक्षण पर जाते थे। इस कोठी से नहरों में जल प्रवाह, नहर की सफाई, पुलों और रेगुलेटरों का निरीक्षण तथा किसानों को सिंचाई जल उपलब्ध कराने की व्यवस्था नियंत्रित की जाती थी। वर्षा ऋतु और बाढ़ के समय यही भवन नियंत्रण केंद्र के रूप में कार्य करता था।
शारदा–किच्छा फ़ीडर (Sarda–Kichha Feeder) – इसका उद्देश्य रोहिलखंड की पुरानी नहर प्रणाली को अतिरिक्त जल उपलब्ध कराना था। यह फ़ीडर शारदा नहर से जल लेकर देओहा नदी तक पहुँचाती थी। इसके बाद जल बहगुल नदी तक पहुँचाया जाता था। 1914 के अकाल के बाद इस परियोजना को विशेष प्राथमिकता दी गई। इससे लगभग 1.52 लाख एकड़ अतिरिक्त भूमि को सिंचाई का लाभ मिलने का लक्ष्य रखा गया। परियोजना के साथ निरीक्षण व्यवस्था भी विकसित की गई। ब्रिटिश सिंचाई अभियंता नियमित रूप से इस प्रणाली का निरीक्षण करते थे। इसी परियोजना से रिछा, फ़रीदपुर और शाहजहाँपुर शाखाओं को जल मिलता था।
रिछा शाखा – रिछा शाखा शारदा–किच्छा परियोजना की प्रमुख शाखा थी। यह बहगुल नदी के चुरेली बाँध से जल प्राप्त करती थी। इसका उद्देश्य बरेली क्षेत्र में सिंचाई का विस्तार करना था। शाखा का निर्माण ब्रिटिश सिंचाई विभाग द्वारा कराया गया। इसके संचालन की जिम्मेदारी सिंचाई अभियंताओं पर थी।
फ़रीदपुर शाखा – इसका उद्देश्य फ़रीदपुर क्षेत्र में सिंचाई का विस्तार करना था। फ़रीदपुर शाखा बहगुल नदी के गिरेम बाँध (Girem Dam) से प्रारम्भ होती थी। यह शारदा–किच्छा फ़ीडर योजना का अभिन्न भाग थी। ब्रिटिश सिंचाई विभाग इसका संचालन करता था। जल वितरण की नियमित व्यवस्था की जाती थी। शाखा की सफाई और रखरखाव विभागीय कर्मचारियों द्वारा किया जाता था।
सेंट स्टीफन्स चर्च – यह चर्च बरेली कैण्ट में है। चर्च में पीतल के कई शिलालेख है। चर्च में एक गेट दक्षिण की तरफ और एक उत्तर की तरफ है। स्तम्भ- सफेद पत्थर के है। प्रार्थना गृह में लगभग 1000 लोग साथ मिलकर प्रार्थना कर सकते है इस चर्च में भी विशेष प्रकार का फर्नीचर है। यह लाल ईंटों से निर्मित है। इसकी ऊँची मेहराबें, रंगीन काँच की खिड़कियाँ तथा घंटाघर इसकी विशेष पहचान हैं। यह चर्च मुख्यतः ब्रिटिश सैनिकों और अधिकारियों के धार्मिक उपयोग के लिए बनाया गया था। स्वतंत्रता के बाद भी यह धार्मिक और ऐतिहासिक धरोहर के रूप में सुरक्षित है।
बरेली कॉलेज – ब्रिटिश शासन काल में बना यह ऐतिहासिक स्थल है। यह 1837 में एक सरकारी स्कूल के रूप में शुरू हुआ और 1850 में सरकारी कॉलेज का स्तर प्राप्त किया। 1857 की क्रान्ति का यह मुख्य केन्द्र बना और अनेक छात्रों तथा अध्यापकों ने स्वाधीनता संग्राम में अपनी शहादतें दी। 1858-59 ई० में स्थिति थोड़ी सामान्य होने के बाद में कालेज पुनः आरम्भ हुआ और सन् 1861 ई0 के आखिर में हैनरी टेम्पलटन ने बरेली कॉलेज के प्राचार्य का दायित्व स्वीकार किया। 1862 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से इस संस्था को सम्बद्धता मिली और कलकत्ता प्रेसीडेन्सी में इसने विशेष प्रतिष्ठा हासिल की।
बरेली कैंटोनमेंट –औपनिवेशिक शासनकाल में बरेली को रूहेलखंड का सबसे महत्वपूर्ण सैन्य मुख्यालय बनाया गया। नगर के उत्तर-पश्चिम भाग में विशाल कैंटोनमेंट की स्थापना की गई, जहाँ यूरोपीय तथा भारतीय सैनिकों की अलग-अलग बैरकें बनाई गईं। यहाँ पैदल सेना, तोपखाना, और घुड़सवार सेना की स्थायी तैनाती रहती थी। कैंट का संचालन एक ब्रिगेडियर जनरल के अधीन किया जाता था। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय बरेली ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रमुख केंद्र बना और विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने इस छावनी को और अधिक सुदृढ़ किया। कैंटोनमेंट क्षेत्र में सैनिक अस्पताल, परेड मैदान, आयुध भंडार, अधिकारियों के आवास और चर्च जैसी सुविधाएँ विकसित की गईं।
पुरानी कोतवाली:- यहाँ पर क्रान्ति की घोषणा की गई थी यह कोतावाली वर्तमान शास्त्री मार्केट में स्थित थी।
मैरीसन फोर्ट – 1857 की क्रान्ति के बाद खान बहादुर खान को इसी किले में कैद रखा गया था। 1802 में बरेली में अग्रेजों द्वारा छावनी की स्थापना किये जाने पर रेलवे स्टेशन से लगभग 1 किमी० दूर यू०पी० एरिया सिग्नल रेजीमेण्ट के सामने कैण्ट का यह किला आज भी अस्तित्व में है।
बरेली रेलवे स्टेशन – अवध एवं रोहिलखंड रेलवे के निर्माण के बाद बरेली उत्तर भारत का एक प्रमुख रेलवे केंद्र बन गया। रेलवे ने बरेली को लखनऊ, मुरादाबाद, फ़तेहगढ़ और अन्य नगरों से जोड़ दिया। इससे कृषि उत्पादों, कपड़ा, अनाज और अन्य वस्तुओं के व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। रेलवे स्टेशन के आसपास गोदाम, माल-भंडारण स्थल तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठान विकसित हुए।
बरेली कलेक्ट्रेट – ब्रिटिश प्रशासन को व्यवस्थित करने के लिए कलेक्ट्रेट भवन का निर्माण कराया गया। कलेक्ट्रेट में कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर तथा राजस्व अधिकारियों के कार्यालय स्थापित किए गए। विकास संबंधी सभी निर्णय यहीं से लिए जाते थे। कलेक्ट्रेट के निकट कोषागार तथा अन्य सरकारी कार्यालय भी विकसित किए गए।
टाउन हॉल – वर्ष 1868 में अंग्रेजों ने कुतुबखाना पर बड़ा भवन बनाया था, जिसका नाम टाउन हाल रखा था। इसमें उनके सरकारी दफ्तर और एक लाइब्रेरी भी थी। चूंकि उर्दू में लाइब्रेरी को कुतुबखाना कहते हैं, इसलिए धीरे-धीरे यहां का नाम कुतुबखाना पड़ गया| ब्रिटिश शासन के दौरान बरेली नगर में सार्वजनिक बैठकों और प्रशासनिक कार्यक्रमों के लिए टाउन हॉल का निर्माण कराया गया। यहाँ सरकारी सभाएँ, सांस्कृतिक कार्यक्रम और नागरिक बैठकों का आयोजन होता था।
डाक बंगला– निरिक्षण के दौरान डाक बंगले प्रयोग में आते थे |कम्पनी के अधिकारियों के भ्रमण और रात्रि विश्राम के लिए बरेली में डाक बंगले बनाए गए। ये मुख्य सड़कों और प्रशासनिक मार्गों के किनारे स्थित थे। इनमें अधिकारियों के रहने के कमरे, भोजन व्यवस्था और घोड़ों के लिए अस्तबल भी होते थे। डाक बंगले प्रशासनिक संचार व्यवस्था का महत्वपूर्ण भाग थे। इन भवनों ने ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक नियंत्रण को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
नहर निरीक्षण कोठियाँ – ब्रिटिश सरकार ने नहर अधिकारियों के लिए निरीक्षण कोठियाँ बनवाईं। गंगा नहर प्रणाली की सिंचाई व्यवस्था की निगरानी तथा अधिकारियों के विश्राम के लिए नहर कोठी का प्रयोग होता था| कोठियाँ प्रायः नहर के किनारे स्थित होती थीं। इनमें कार्यालय, आवास और अभिलेख रखने की व्यवस्था रहती थी। सिंचाई व्यवस्था के कारण कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई ।
शारदा नहर कोठी– शारदा नहर भारत-नेपाल सीमा के पास बनबासा में शारदा नदी से निकाली गई है। इस नहर का निर्माण कार्य 1928 में पूरा हुआ था। इस योजना के दो भाग हैं: मुख्य शारदा नहर और शारदा किच्छा सहायक नहर। मुख्य भाग अवध के उत्तर पश्चिमी जिलों की सिंचाई के लिए एक व्यापक परियोजना है, जबकि दूसरा भाग रोहिलखंड की मौजूदा नहरों के विस्तार के लिए जल आपूर्ति सुनिश्चित करता है। इसके बाद, शारदा नहर दक्षिण दिशा में बहती है, जबकि सहायक नहर हिमालय की तलहटी में स्थित निचले इलाके तराई से होकर गुजरती है।
केन्द्रिय कारागार :- इसकी स्थापना अंग्रेजों के समय में हुई थी। यह इज्जतनगर रेलवे स्टेशन के सामने स्थित है। इस जेल में जवाहर नेहरू, गोविन्द वल्लभ पन्त आदि नेता बन्द रहे थे। ब्रिटिश शासनकाल में बरेली जिला जेल उत्तर भारत की महत्वपूर्ण कारागारों में से एक थी। इसका निर्माण आधुनिक जेल प्रशासन की नीति के अंतर्गत किया गया। यहाँ दीर्घकालीन और अल्पकालीन दोनों प्रकार के कैदियों को रखा जाता था। 1857 के बाद अनेक स्वतंत्रता सेनानियों और विद्रोहियों को भी यहाँ बंद रखा गया।
जिला अस्पताल – आधुनिक चिकित्सा सेवाएँ उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बरेली में जिला अस्पताल की स्थापना से की गई। अस्पताल में एलोपैथिक चिकित्सा, शल्य चिकित्सा तथा संक्रामक रोगों के उपचार की व्यवस्था थी। कुछ समय बाद महिला अस्पताल (लेडी डफरिन हॉस्पिटल) और अन्य डिस्पेंसरियाँ भी स्थापित की गईं। यह अस्पताल केवल नगर ही नहीं, बल्कि पूरे रोहिलखंड क्षेत्र के लोगों के लिए महत्वपूर्ण स्वास्थ्य केंद्र था। ब्रिटिश काल में महिलाओं के उपचार हेतु लेडी डफरिन अस्पताल की स्थापना की गई। उस समय प्रसूति एवं स्त्री रोग चिकित्सा के लिए अलग अस्पताल होना एक महत्वपूर्ण सुधार माना जाता था। यहाँ प्रशिक्षित चिकित्सकों और नर्सों की नियुक्ति की गई।
सर्किट हाउस – ब्रिटिश अधिकारियों की सरकारी यात्राओं के लिए बरेली में सर्किट हाउस का निर्माण कराया गया। सर्किट हॉउस कलेक्टर, कमिश्नर, न्यायाधीश तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के अस्थायी निवास के लिए प्रयुक्त होता था। सर्किट हाउस प्रायः सिविल लाइन्स क्षेत्र के निकट स्थापित किया जाता था जिससे प्रशासनिक कार्यालयों तक पहुँच आसान रहे। यहाँ कई महत्वपूर्ण सरकारी बैठकों और निरीक्षण कार्यक्रमों का आयोजन होता था।
कम्पनी गार्डन – अंग्रेजो की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने सन् 1801 में बरेली पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। उसके पश्चात एक राजकीय उद्यान (गार्डन) बनाया जिसको ईस्ट इण्डिया कम्पनी के नाम पर कम्पनी गार्डन नाम दिया गया। ब्रिटिश शासन के उत्तरार्ध में सिविल लाइन्स के समीप कंपनी गार्डन का विकास किया गया, जिसे आज गांधी उद्यान के नाम से जाना जाता है। इसका उद्देश्य अंग्रेज अधिकारियों और नगरवासियों को मनोरंजन तथा सार्वजनिक विश्राम का स्थान उपलब्ध कराना था। उद्यान में वृक्षारोपण, पुष्प उद्यान, पथ तथा बैठने की व्यवस्था की गई। समय-समय पर यहाँ सांस्कृतिक एवं सामाजिक कार्यक्रम भी आयोजित होते थे। स्वतंत्रता के बाद इसका नाम गांधी उद्यान रखा गया, किंतु इसकी मूल योजना ब्रिटिश काल में ही विकसित हुई थी।
मिशन अस्पताल (Clara Swain Mission Hospital) – डॉ० क्लैरा द्वारा एक चिकित्सा केन्द्र बनाया गया। रामपुर के नवाब ने अपनी 42 एकड़ भूमि व अपनी कोठी अस्पताल को दान में दी। मई 1873 में एक नई डिस्पेंसरी बिल्डिंग बन गई और जनवरी 1874 में यहाँ मरीज भर्ती किए जाने लगे। क्लैरा स्वेन ने बरेली आते ही लड़कियों को नर्सिंग प्रशिक्षण भी देना शुरू कर दिया था। अस्पताल ने स्थानीय समाज में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ चिकित्सा शिक्षा को भी प्रोत्साहित किया।
बदायूं कलेक्ट्रेट – ब्रिटिश शासन स्थापित होने के बाद बदायूँ को एक महत्वपूर्ण जिला मुख्यालय के रूप में संगठित किया गया। जिला प्रशासन को व्यवस्थित करने के लिए कलेक्ट्रेट भवन की स्थापना की गई। भूमि राजस्व का निर्धारण, कर संग्रह, कानून-व्यवस्था और सरकारी आदेशों का क्रियान्वयन यहीं से होता था।
बदायूँ डाक बंगला – डाक बंगला प्रमुख सड़कों और प्रशासनिक मार्गों पर स्थित होते थे। इनमें अधिकारियों के विश्राम, भोजन और बैठकों की व्यवस्था रहती थी। कई डाक बंगलों में घोड़ों के अस्तबल और बाद में मोटर वाहनों के लिए गैरेज भी बनाए गए। निरीक्षण यात्रा पर आने वाले कलेक्टर, कमिश्नर और इंजीनियर इन्हीं भवनों में ठहरते थे।
शाहजहाँपुर कैंटोनमेंट – शाहजहाँपुर रोहिलखंड का एक अत्यंत महत्वपूर्ण सैन्य नगर था। अवध एवं रोहिलखंड रेलवे से जुड़ने के बाद इसका सामरिक महत्व और बढ़ गया। नगर के निकट ब्रिटिश सेना के लिए एक सुव्यवस्थित छावनी (कैंटोनमेंट) स्थापित की गई, जहाँ यूरोपीय तथा भारतीय सैनिकों की टुकड़ियाँ रहती थीं। छावनी में बैरकें, परेड मैदान, अस्त्र-शस्त्र भंडार, अधिकारियों के बंगले, सैनिक अस्पताल तथा घुड़सवार सेना के अस्तबल बनाए गए। कैंटोनमेंट से बरेली, लखनऊ और अन्य प्रमुख सैन्य केंद्रों के साथ संपर्क बनाए रखा जाता था।
सेंट पॉल चर्च – शाहजहाँपुर के प्रमुख ब्रिटिशकालीन धार्मिक भवनों में यह चर्च महत्वपूर्ण है। इसका निर्माण ब्रिटिश सेना तथा ईसाई अधिकारियों की धार्मिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कराया गया। चर्च की वास्तुकला गोथिक शैली से प्रभावित थी, जिसमें ऊँची मेहराबें, रंगीन काँच की खिड़कियाँ, घंटाघर तथा लंबा प्रार्थना कक्ष प्रमुख विशेषताएँ थीं। चर्च केवल उपासना का स्थान नहीं था, बल्कि सामाजिक और शैक्षिक गतिविधियों का भी केंद्र था। इसके माध्यम से मिशनरी संस्थाओं ने विद्यालय तथा चिकित्सा सेवाओं का भी विस्तार किया। ब्रिटिश शासन के दौरान क्रिसमस, ईस्टर और अन्य धार्मिक समारोह यहीं आयोजित किए जाते थे।
शारदा नहर निरीक्षण कोठियाँ – शारदा नहर प्रणाली के विकास के साथ पीलीभीत में अनेक नहर निरीक्षण कोठियों का निर्माण कराया गया। इन भवनों का उपयोग सिंचाई विभाग के अभियंताओं और अधिकारियों द्वारा निरीक्षण यात्राओं के समय किया जाता था। प्रत्येक कोठी में आवासीय कक्ष, कार्यालय, बरामदा और अभिलेख रखने की व्यवस्था होती थी। नहरों के जल वितरण, मरम्मत तथा सिंचाई व्यवस्था की निगरानी यहीं से की जाती थी। इन कोठियों ने कृषि उत्पादन बढ़ाने तथा राजस्व वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
वन विभाग विश्राम गृह – ब्रिटिश काल में पीलीभीत तराई और घने वनों वाला क्षेत्र होने के कारण ब्रिटिश शासन ने यहाँ वन अधिकारियों के लिए विश्राम गृहों का निर्माण कराया। इन भवनों का उपयोग वन संरक्षण, लकड़ी के व्यापार, शिकार नियंत्रण तथा वन निरीक्षण के दौरान किया जाता था। विश्राम गृह प्रायः प्रमुख वन क्षेत्रों और सड़कों के निकट बनाए गए। इनमें आवास, कार्यालय तथा बैठक की व्यवस्था होती थी। वन विभाग के अधिकारी यहीं से जंगलों का निरीक्षण, वन उपज का लेखा-जोखा तथा संरक्षण कार्यों की निगरानी करते थे।
सिविल लाइन्स – रामपुर क्षेत्र में भी चौड़ी सड़कें, वृक्षों से घिरे मार्ग, सरकारी बंगले तथा प्रशासनिक भवन बनाए गए। यहाँ वरिष्ठ अधिकारी, अभियंता और प्रशासनिक कर्मचारी निवास करते थे। यह क्षेत्र पुराने शहर से अलग योजनाबद्ध ढंग से विकसित किया गया और आधुनिक नगर नियोजन का उदाहरण माना जाता है
सार्वजनिक निर्माण विभाग – रामपुर राज्य के सार्वजनिक निर्माण विभाग ने अनेक सरकारी भवनों, पुलों, सड़कों तथा कार्यालयों का निर्माण और रखरखाव किया। समकालीन विवरणों के अनुसार तहसील मुख्यालयों पर मजबूत कार्यालय भवन बनाए गए तथा सड़कों, पुलों और नहरों का नियमित रखरखाव किया जाता था। इससे प्रशासनिक नियंत्रण मजबूत हुआ और व्यापार तथा आवागमन को प्रोत्साहन मिला।
जिला चिकित्सालय – रामपुर में आधुनिक चिकित्सा सेवाओं के विकास के लिए जिला चिकित्सालय और डिस्पेंसरी की स्थापना की गई। अस्पताल में सामान्य चिकित्सा, औषधि वितरण, शल्य चिकित्सा तथा संक्रामक रोगों के उपचार की व्यवस्था थी। भवन में अलग-अलग वार्ड, औषधालय तथा चिकित्सकों के कक्ष बनाए गए थे। इस अस्पताल का उद्देश्य केवल राज्य के कर्मचारियों का उपचार करना नहीं था, बल्कि सामान्य जनता को भी आधुनिक चिकित्सा उपलब्ध कराना था।
मुरादाबाद पुलिस लाइन -मुरादाबाद में पुलिस संगठन को सुदृढ़ करने के लिए पुलिस लाइन की स्थापना की। यहाँ पुलिस बल के प्रशिक्षण, परेड, शस्त्रागार, घुड़सवार दस्ते तथा अधिकारियों के आवास की व्यवस्था की गई। मुरादाबाद रोहिलखंड मंडल का महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र होने के कारण यहाँ की पुलिस लाइन का विशेष महत्व था। इसी परिसर से जिले के विभिन्न थानों का नियंत्रण तथा कानून-व्यवस्था की निगरानी की जाती थी।
सेंट पॉल चर्च (St. Paul’s Church) -मुरादाबाद में ईसाई अधिकारियों, सैनिकों तथा स्थानीय ईसाई समुदाय के लिए चर्च की स्थापना की गई। इसकी वास्तुकला गोथिक शैली से प्रभावित थी, जिसमें ऊँची मेहराबें, रंगीन काँच की खिड़कियाँ तथा घंटाघर प्रमुख विशेषताएँ थीं। चर्च केवल धार्मिक उपासना का स्थान नहीं था, बल्कि शिक्षा, सामाजिक सेवा और मिशनरी गतिविधियों का भी केंद्र था। इसके माध्यम से विद्यालय तथा चिकित्सा सेवाओं का भी विकास हुआ
नजीबाबाद डाक बंगला – नजीबाबाद रोहिलखंड और गढ़वाल को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र था। अधिकारियों के आवागमन और निरीक्षण कार्यों के लिए यहाँ डाक बंगले का निर्माण कराया गया। यह भवन मुख्य सड़क के निकट स्थित था और इसमें विश्राम कक्ष, बैठक कक्ष तथा भोजन कक्ष की व्यवस्था थी। राजस्व, वन, पुलिस तथा लोक निर्माण विभाग के अधिकारी निरीक्षण यात्राओं के दौरान यहीं ठहरते थे। डाक बंगले से आसपास के क्षेत्रों का प्रशासनिक निरीक्षण किया जाता था।
सन्दर्भ ग्रन्थ
- गजेटियर ऑफ पीलीभीत डिस्ट्रिक, खण्ड-XVIII, द यूनाइटेड प्रॉविन्सस ऑफ आगरा एण्ड अवध, इलाहाबाद: द सुप्रिटेंडेंट गवर्नमेन्ट प्रेस, यूनाइटेड प्रॉविन्सस, 1909.
- गजेटियर ऑफ रामपुर स्टेट गवर्नमेन्ट प्रिन्टिग प्रेस यूनाइटेड प्रॉविन्सस, इलाहाबाद : 1911.
- गजेटियर ऑफ बदायूँ डिस्ट्रिक, खण्ड-XV, द यूनाइटेड प्रॉविन्सस ऑफ आगरा एण्ड अवध, इलाहाबाद: द सुप्रिटेंडेंट गवर्नमेन्ट प्रेस, यूनाइटेड प्रॉविन्सस, 1907
- गजेटियर ऑफ बिजनौर डिस्ट्रिक, खण्ड-XII, द यूनाइटेड प्रॉविन्सस ऑफ आगरा एण्ड अवध, इलाहाबाद: द सुप्रिटेंडेंट गवर्नमेन्ट प्रेस, यूनाइटेड प्रॉविन्सस, 1908.




