ISSN : 2583-8725

बाबू जुगलकिशोर जैन ‘मुगल’ के साहित्य में निहित नैतिक मूल्य

डा. ऋषभ चन्द्र फोजदार
शोध-निर्देशक विभागाध्यक्ष,
एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह

गणवंत जैन
शोध-छात्र
एकलव्य विश्वविद्यालय, दमोह

“दार्शनिक होना केवल सूक्ष्म विचार रखना ही नहीं है, वरन् ज्ञान की उच्चतर से आराधना करना है जिससे जीवन उन्नीय हो सके।”

किसी विद्वान की उक्त पंक्ति किसी भी व्यक्तित्व का मूल्यांकन करने में समर्थ है। आज सम्पूर्ण विश्व में अनेक प्रकार के विद्वान, लेखक, वक्ता, पण्डित, शिक्षक आदि से विभूषित लाखों लोग हैं जिन्होंने विचार का आदान-प्रदान तो पूर्णरूप से किया है किन्तु समाज, समुदाय या राष्ट्र का निर्माण हो ऐसा उनका कोई कृत्य कम ही देखने में आता है।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियाँ सहज ही स्मृत होती हैं—

हम कौन थे ? क्या हो गये हैं ? और क्या होंगे अभी ?

आओ विचारें बैठकर के, ये समस्यायें सभी ॥

ऐसे लेखनी, वाणी या पाण्डित्यपने का क्या लाभ ? जो किसी परिवार, समाज या राष्ट्र में जनचेतना का संचार न कर सके। वह लेखनी, वाणी या पाण्डित्य कौशल निष्फल है, जिसका नैतिकता से कोई सम्बन्ध नहीं। हजारों लोगों में एक भी व्यक्ति की लेखनी / वाणी यदि नैतिक मूल्यों को बचा सकती है, तो वह व्यक्तित्व पूजनीय, वंदनीय है। वही सरस्वती का सपूत है। कहा भी है—

“एकमेव सुशोभनं, सीहिहि स्वापति निर्भयः।”
आज समाज में चारों ओर नैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों का हास हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। ऐसे में जिस किसी भी माध्यम से हो इनके नैतिक मूल्यों की स्थापना का प्रयत्न करना चाहिए।

शिक्षा की चुनौती नीति सम्बन्धी परिप्रेक्ष्य, शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार 1985 पृष्ठ क्रमांक 07 पर कहा भी है—

“सभी प्रकार के विचारशील लोग मूल्यों के तेजी से हो रहे हास से तथा उसके परिणामस्वरूप सार्वजनिक जीवन में व्याप्त प्रदूषण से बहुत विचलित हैं। वास्तव में मूल्यों की यह संकटग्रस्त स्थिति जिस प्रकार जीवन के अन्य अंगों में व्याप्त है उसी प्रकार स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों के छात्रों तथा शिक्षकों में व्याप्त है। इसे एक बहुत खतरनाक विकार के रूप में माना जाता है। अतः यह आग्रह किया जाता है कि शिक्षा की प्रक्रिया का पुनः अभिविन्यास किया जाये तथा युवकों को इस बात की पुनः अनुभूति करायी जाये कि इस तरह न तो शोषण, असुरक्षा तथा हिंसा को रोका जा सकता है और न ही किसी संगठित समाज को सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक मानदण्डों को स्वीकार किये और पालन किये बिना बनाये रखा जा सकता है। पिछले अनुभवों से यह सीखते हुये यह आशा की जाती है कि सुसंगत तथा व्यवहार मूल्य प्रणाली को ऐसी प्रक्रियाओं के माध्यम से लागू किया जाये जो जीवन के प्रति तर्कसंगत, वैज्ञानिक तथा नैतिक दृष्टिकोण पर आधारित हों।”

राष्ट्र के सम्बन्ध में विचार करने वाली इस कमेटी के सदस्यों को बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल के साहित्य का अध्ययन अवश्य करना चाहिए। क्योंकि बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल ने अपनी पूरी साहित्य साधना में केवल मूल्य-परक विवेचना ही की है।

जिस समस्या से आज ये देश जूझ रहा है बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल ने उनका सैद्धान्तिक समाधान तर्क, युक्ति एवं भावना के बल पर अपनी वाणी और अपने साहित्य से दिया है। उन्होंने अपने साहित्य में निम्न मूल्यों को उजागर किया है—

  1. नैतिक मूल्य
  2. सामाजिक मूल्य
  3. सांस्कृतिक मूल्य
  4. शैक्षिक मूल्य
  5. आर्थिक मूल्य
  6. राजनीतिक मूल्य
  7. धार्मिक मूल्य
  8. आध्यात्मिक मूल्य
  9. दार्शनिक मूल्य

जहाँ तक मूल्यों की बात है तो जीवन को शुद्ध करने व पवित्र भावना बनाने के लिये नैतिक मूल्यों की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल ने गद्य, पद्य की सभी विधाओं एवं सभी शैलियों में अपनी लेखनी का जीवन्त प्रमाण दिया ही है। इसके अलावा सभी विधाओं में नैतिकता का साथ कहीं नहीं छोड़ा।

बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल जहाँ कठोर अनुशासन के पथप्रदर्शी पथिक हैं तो वहीं जिनागमों के अनुसरण करने, क्या पाने और कर्मवाई चित्त की भावभूमि तैयार करने के लिये मजबूतरूप से उकेरते हुए दिशाबोधी पथिक हैं।

बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल एकमात्र ऐसे लेखक हैं जिन्होंने सभी काव्य-विधाओं और गद्य-लेखन की लगभग सभी विधाओं को स्पर्श किया है। न केवल आपने स्पर्श किया अपितु उन विधाओं के माध्यम से जनजनों को अध्यात्म-सागर में स्नान करने का अवसर भी उपलब्ध कराया है।

“प्रतिभायें लीक (लाइन) पर नहीं बल्कि लीक (लाइन) से हटकर चलती हैं। परन्तु सच्ची व असल प्रतिभायें वे हैं जो लीक (लाइन) से तो हटें पर लीक (लाइन) से भटकें नहीं।”

आचार्यकुल पण्डित टोडरमल जी के व्यक्तित्व को जनेजेन्द्री की समक्ष उपस्थित करने के लिये डॉ. हुकमचन्द भारिल्ल द्वारा लिखी ये पंक्तियाँ बाबू जुगलकिशोर जैन के व्यक्तित्व को परिभाषित करने में सटीक बैठती हैं। क्योंकि आप भी उन्हीं प्रतिभाओं में से एक हैं, जिन्होंने हर पहलू की सूक्ष्मता को अपनी लेखनी से व्यक्त किया है। आपके साहित्य में निहित मूल्य और उनकी अवधारणा पर कई विद्वान लेखकों ने आमेक्ति दी है, परन्तु आपने जहाँ आध्यात्मिकता व सामाजिक एकता पर बल दिया, वहीं नैतिक मूल्यों को नहीं छोड़ा है।

आपके साहित्य में नैतिक मूल्य कूट-कूट कर भरे हुए हैं। आपने जहाँ देव-शास्त्र-गुरु के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करके सर्वोच्च विनय व उत्कृष्ट शिष्टाचार का परिचय दिया वहीं पूज्य गुरुदेवश्री का उपकार-स्मरण करके सार्थक शिष्यत्व का परिचय देकर अनुशासन, लौकिक विनय व नैतिकता का ध्यान रखा है। आपने अनेक संस्थाओं में इस कृतज्ञता का परिचय अनेकों बार दिया है। इसके अलावा आपके साहित्य में निम्न नैतिक मूल्य भी उजागर हुए हैं—

  1. ईमानदारी
  2. त्याग
  3. निष्ठा
  4. करुणा
  5. उत्तरदायित्व की भावना
  6. नम्रता
  7. सत्य-प्राप्ति की लालसा
  8. दोष-स्वीकारोक्ति
  9. मानवीयता
  10. पारिवारिक एकता
  11. आत्ममंथन की भावना
  12. कर्तव्य-पालन

इन सब नैतिक मूल्यों का विवेचन बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल के साहित्य में वर्णित है जिनका क्रमशः वर्णन किया जा रहा है—
1. ईमानदारी – जीवन में सफलता पाने के लिये सबसे सरल और कठिन रास्ता है ईमानदारी। यदि व्यक्ति ईमानदार नहीं है तो वह जीवन में कुछ भी नहीं कर सकता। (आगे का पाठ चित्र में उपलब्ध नहीं है।)
सकता है। बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल के साहित्य में ईमानदारी के द्योतक कुछ उदाहरण दृष्टव्य हैं—

किसका करोगे विश्वास वसुधरा में ?
जड़ की नगरीयों में जाने की मनाही है।
अपना चरित्र क्यों गिराते पर की हविशों में,
स्वयं ही यशस्वी बन, बेहद अमराई है।
— “विश्वास” मुक्तक

चैतन्य का स्मरण प्रतिपल करो रे!
भव के अनन्त दुःख को पल में हरो रे!
अक्षय-अनन्त निज सौख्य नितल पाओ,
गाओ, अरे! बस इसी के गीत गाओ।।
— “चैतन्य के गीत”

उक्त दोनों मुक्तक के आधार से देखें तो हम जान पायेंगे कि बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल स्वयं भी अपनी कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहे और अपनी लेखनी से जगत को यही सन्देश दिया।

2. त्याग (समर्पण) – त्याग का अर्थ छोड़ना ही नहीं वरन् नैतिकता के आकलन से देखें तो त्याग का अर्थ बलिदान और समर्पण भी है, जो हमेशा दूसरों के लिये होता है और वह समर्पण इतना कि स्वयं का सम्पूर्ण नाश भी बर्दाश्त हो जाये किन्तु सामने वाला प्रसन्न रहना चाहिये। बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल ने अपनी अनेक प्रकाशित अप्रकाशित रचनाओं में त्याग, समर्पण और मोक्ष-प्राप्ति के लिये… (आगे का पाठ चित्र में उपलब्ध नहीं है।)

सर्वस्व समर्पण की प्रेरणा दे दी है। इसी तरह का एक उदाहरण “शरद पूर्णिमा” कविता में व्यक्त किया है—
“अहो! जब परतन्त्र्य ही मृत्यु, कहो तब क्यों जीवन की आस।
कभी क्या परतंत्र में मिला, किसी को जीवन का आभास।।

बना है आज देश परतंत्र, कर रही तू क्रीड़ा का साज।
त्याग री त्याग निडर! अब त्याग लगा दे निबल हिये में आग।।

जगाकर जन को कर स्वाधीन, सिखा निज-गौरव से अनुराग।
जाग जाये भारत के बाल सीख स्वाधीन प्रेम का पाठ।।”

3. निष्ठा – अपने आराध्य के प्रति पूर्ण व मजबूत आस्था का नाम ही सच्ची ‘निष्ठा’ है। बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल ने देवशास्त्रगुरु पूजन में इस बात के स्पष्ट संकेत दिये और उनके गुणगान में आरस-स्तुति की रचना की। पूज्यपद को नमस्कार करते हुए उन्होंने लिखा—

केवल रवि किरणों से जिसका, सम्पूर्ण प्रकाशित है अन्तर।
उस भी जिनवाणी में होता, तत्वों का सुन्दरतम दर्शन।।

सद्दर्शन बोध चरण पथ पर, अविरल जो बढ़ते हैं मुनिगण।
उन देव-परम-आगम गुरु को, शत् शत् वन्दन। शत् शत् वन्दन।।

एक और उदाहरण दृष्टव्य है—

“कलि पंचम में देवता, ताकौ नाम कहान।
उड़ा दिया है मौत का जन आँधी तूफान”।।

4. करुणा/दया – सच्चा मनुष्य वही है जो दूसरों के दुःखों को देखकर दुःखी हो और आत्म-आनन्दित उन दुःखों को दूर करने का प्रयास करे। बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल जब तक स्वदेशी के धरातल में रहे आये थे तब तक वे दया पर दया का साहित्य में स्थान रखा। जिसको हम मानव कविता में देख सकते हैं—

“शान्त हृदय सा बैठा मानव, हिय में आशा-जाल बिछाये।
बैसुध, दीवाना, मतवाला, अपने रंग का साज सजाये।।

क्यों कर जाने बहुविधि-गति, आशा का मुसकाया मानव।
देख रहा नश्वर-जीवन को, आशा का ठुकराया मानव”।।

5. उत्तरदायित्व की भावना – किसी भी कार्य की सफलता से यह परम आवश्यक है कि आप सबको संगठित कर सकें। यदि सभी संगठित हैं तो हर कार्य सफल है। यथोक्त “संघे शक्ति कलौ युगे” अर्थात् संगठन में रहने पर प्रत्येक व्यक्ति को अपने साथियों का स्वतः भान होता है तथा नेतृत्वकार द्वारा दिया जाता है। बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल ने अपने साहित्य से समाज को संगठित रहने व स्वयं के दायित्व का निर्वाह करने की प्रेरणा दी है। जिसे हम बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल की एक रचना “उन्नत समाज” में स्पष्ट रूप से देख सकते हैं—

हम कर्मवीर बनकर आयें, सत्वर समाज में आयेंगे,
अन्याय अनीति-बहाने को, हम बनकर धन छा जायेंगे।

सब पाप और पाखंड मिटा हम प्रेम सुधा बरसायेंगे,
दुर्बल अरात को बढ़ आगे हम अपने गले लगायेंगे।

रण समाज के स्वास्थ्य हेतु इस सत्वर यह उपचार करें।
हिय में उमंग उत्साह लिये, हम उन्नति पथ को प्यार करें।।

6. दोष-स्वीकारोक्ति – स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ फल निश्चित ही दे देंगे। करें आप फल देय अन्यथा तो स्वयं किये निष्फल होंगे। बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल की इन पंक्तियों के आधार पर यह सिद्ध किया कि व्यक्ति/जीव अपनी गलती का ठीकरा दूसरों के सिर फोड़कर स्वयं मुक्त होना चाहता है जिससे उसकी सांसारिक निरन्तर बढ़ता जा रहा है। अतः बाबूजी स्वयं इस बात को मानते भी हैं कि अपने दोष स्वीकार करने पर ही जीव दोष-मुक्त होने की राह पर आगे बढ़ता है।

7. सत्य प्राप्ति की लालसा – जीवन का शाश्वत लक्ष्य चारित्रोपलब्धि या सत्योपलब्धि है। इस सत्योपलब्धि के लिये व्यक्ति अनेक प्रकार के उपक्रम करता है, जिससे यथार्थ पथ को जान लेने की क्षमता भी है। “स्वप्न या कल्पना जितनी मधुर होती है, यथार्थ उतना ही कटु।” यथार्थ के धरातल पर ही जीवन की वास्तविकता के निमित्त सत्य का आभास हो पाता है। इसी यथार्थ भावना या सत्य का ज्ञान कराने में बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल का साहित्य पूर्णतः सक्षम है।

8. पारिवारिक एकता – बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल का साहित्य राष्ट्रीय और सामाजिक एकता का प्रतीक है। नैतिक मूल्यों के हास से चिन्तित जहाँ एक कुटुम्ब एकल परिवार की ओर मुड़ रहा है वहीं बाबू जुगल किशोर जैन मुगल ने परिवार के विघटन को रोक एकता के सूत्र में बाँधे रहने के उपाय बताये हैं—

हो अगर हृदयों दूर, शीघ्र यह हो सकता है उन्नत समाज,
संगठित आज हिल-मिलकर हम कर सकें बिगड़े सभी काज।

जब क्षीण-सूत आपस में मिल बन जाता है रस्सी दृढ़-वज्र,
तब उसे तोड़ने का साहस, करते उद्दण्ड पुरुष भी कम।।

इस लिये परस्पर सभी आज, हम प्रेमपूर्ण व्यवहार करें…..।

9. मानवीयता – “मनुष्य की पहचान उसके मानवीय कर्मों से है, विवेक से है, न कि बाह्य, भय, निद्रा और मैथुन से”। संस्कृत साहित्यकार ने सत्य लिखा है कि ये चारों संवेग सभी प्राणियों में समान होती हैं, परन्तु मनुष्य में मानवीयता उन सब प्राणियों से पृथकता बताती है। बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल के साहित्य में मानवीयता का पथ उजागर करने वाले उदाहरण दृष्टव्य हैं—

सब पाप और पाखंड मिटा हम प्रेम सुधा बरसायेंगे,
दुर्बल अरात को बढ़ आगे हम अपने गले लगायेंगे।

10. आत्मीयता की भावना – नैतिक मूल्यों में सर्वाधिक उपयोगी मूल्य है आत्मीयता की भावना। जिससे सभी जीवों का कपट स्वयं का कपट जैसा अनुभव होता हो तथा स्वार्थों का विवाद जाये। किसी वस्तु-द्रव्य से दृष्टि हटाकर स्व-उपयोग में ठहरने के नाम आत्मीयता की भावना है। बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल का साहित्य अधिकतम इसी भावना से ओत-प्रोत है। सद्ग्रंथ अध्ययन के साथ आत्मीयता की प्रेरणा बाबू जुगल किशोर जैन मुगल ने अपने कृतित्व से की है।

इसके अतिरिक्त बाबू जुगल किशोर जैन मुगल का साहित्य समता, कर्तव्यनिष्ठा, सहदयता, निष्पक्षता आदि अनेक नैतिक गुणों से भरपूर है। वास्तव में देखा जाये तो पामर से ज्ञानी, पशु से परमात्मा तथा संज्ञी मनुष्यत्व का दर्शन कराने वाला बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल का साहित्य नैतिक मूल्यों से भरा पड़ा है। आशा है लाभार्थी जीवन में नैतिकता का संचार करने के लिये नैतिक मूल्यों को ग्रहण करने के लिये बाबू जुगलकिशोर जैन मुगल के साहित्य का अवलोकन अवश्य करेंगे।

सन्दर्भ सूची –

  1. बाबू जुगल किशोर जैन मुगल, सम्पादक ब्र. नीलिमा जैन कोटा, चैतन्य वाटिका (द्वितीय संस्करण)
  2. बाबू जुगल किशोर जैन मुगल, सम्पादक ब्र. नीलिमा जैन कोटा, जैन शिखर के उदित नक्षत्र (प्रथम संस्करण)
  3. बाबू जुगल किशोर जैन मुगल, सम्पादक ब्र. नीलिमा जैन कोटा, चैतन्य की सुरभित पाँखुरियाँ (प्रथम संस्करण)
  4. बाबू जुगल किशोर जैन मुगल, सम्पादक ब्र. नीलिमा जैन कोटा, गुणावली सिद्धों की (2024)
  5. बाबू जुगल किशोर जैन मुगल, सम्पादक ब्र. नीलिमा जैन कोटा, चैतन्य की चहल-पहल

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