वंदना गुप्ता (शोध छात्रा )
इतिहास विभाग
गाँधी –फैज़ –ए –आम कॉलेज शाहजहांपुर
महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विवि बरेली)
डॉ समन जेहरा जैदी(अस्सिस्टेंट प्रोफेसर)
इतिहास विभाग
गाँधी-फैज़-ए-आम कॉलेज शाहजहांपुर
(महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विवि बरेली)
सारांश
परिवहन तन्त्र एवं संचार के साधनों का अभाव आर्थिक उत्थान के मार्ग में प्रधान अवरोधक होता है। ब्रिटिश सरकार ने भारत में पक्की सड़कों का निर्माण करवाया| आगरा, अवध ,रूहेलखंड, कुमाऊँ राज्य के उद्योगों को विकास हेतु चुना गया और इस योजना के अन्तर्गत सभी व्यापारिक केन्द्रों को सड़क व रेल मार्गो के माध्यम से जोड़ने का प्रयास किया। 1872 में मुरादाबाद रेलवे का श्रीगणेश हुआ। यह रेलवे लाइन अलीगढ़,मुरादाबाद व चन्दौसी-बरेली के बीच एक सम्पर्क पथ का काम करती थी। 1873 में मुरादाबाद से बनारस के मध्य रेल पथ चालू हुआ। उस समय पांच रेलवे स्टेशन बहजोई, चन्दौसी, बिलारी, कुन्डारकी और मुरादाबाद थे। 1874 में राम गंगा पुल का निर्माण हुआ। बरेली से काठगोदाम तक छोटी लाइन का प्रारम्भ 1884 में हुआ। बरेली से सोरों तक छोटी लाइन 1903 में जोड़ी गई जिस पर 1906 में यात्रा शुरू हुई। रूहेलों के शासन काल में बरेली-सिरौली मार्ग के प्रमाण आज भी प्राप्त होते हैं तथा बरेली सम्भल मार्ग का भी प्रमाण है जिसकी शाखा बदायूँ, आँवला तथा बरेली शाहजहाँपुर मार्ग पर है। 1884 के बाद लालकुआँ काशीपुर और मुरादाबाद-काशीपुर के बीच रेल सम्पर्क हुआ। इन रेल पथों पर मालगाड़ियों का संचालन भी शुरू हुआ जिससे धातुओं, कपड़ों, आदि का व्यापार आसान हो गया। रूहेलखंड में परिवहन तन्त्र एवं संचार के साधन किसी भी प्रकार के आर्थिक, सांस्कृतिक,सामाजिक विकास के लिए अनिवार्य तत्त्व हैं परन्तु मात्र परिवहन सुविधा उपलब्ध होने से उद्देश्यों की प्राप्ति नहीं हो सकती इनके साथ संसाधन एवं पूंजी की उपलब्धता, तकनीकी क्षमता, शिक्षा एवं प्रशिक्षण, कुशल नेतृत्व आदि कई तत्व अपेक्षित हैं | इस शोध पत्र में ब्रिटिश शासन ने रुहेलखंड में परिवहन के क्षेत्र में विकास किस प्रकार किया उसका विस्तृत विश्लेषण किया गया है |
मुख्य शब्द –रेल परिवहन,सडक परिवहन,जल परिवहन, यातायात
यातायात के साधनों का उद्भव एवं विकास मानव सभ्यता के विकास के इतिहास के साथ ही जुड़ा है यातायात के माध्यम से नये व्यापारिक, सांस्कृतिक और धार्मिक केन्द्रों को स्थापना होती चलती है और इन केन्द्रों में स्वतः एक ऐसी सामाजिक संस्कृति विकसित होती है जो नयी परम्पराओं को जन्म देती है। 1 कालान्तर में मानव पालतु पशुओं के साथ झुण्ड बनाकर चलते थे इस झुण्ड को ‘कारवां कहते थे। परिवहन के साधनों के विकास में मध्यकाल में मुस्लिम शासकों ने सड़क निर्माण कार्य में बड़ी दिलचप्सी ली और इस कार्य को बड़े हर्षोल्लास से कराया। इस समय पक्की सड़कें नहीं थी किंतु कच्ची सड़कें स्पष्ट थी। ऐसे मार्गों पर पशुओं द्वारा खींची जाने वाली पहियादार गाड़ी सुविधापूर्वक चलती थी। जैसे बैल, भैंस टट्टू, ऊँट और घोड़े यातायात के सामान्य साधन थे।
मुगल भारत में तटीय क्षेत्र और कई नौगम्य नदियाँ थीं, इसलिए तटीय और नदी परिवहन भारी मात्रा में माल और उच्च श्रेणी के उत्पादों के परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित कराया गया मार्ग महत्वपूर्ण था जो दिल्ली से मथुरा, आगरा, इटावा, इलाहाबाद, बनारस, पटना, पश्चिम बंगाल को व दिल्ली, अलीगढ़, एटा, कानपुर को महत्वपूर्ण स्थानों से जोडते थे और जिला मुख्यालयों को कच्चे मार्गो से जोड़ा गया था।
औपनिवेशिक काल में परिवहन के साधनों का विकास सामान्य रूप से हुआ क्योंकि इस समय भारत में 1600 ई0 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना हो चुकी थी और औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप उद्योगों तथा मशीनीकरण का विकास हुआ परिणाम स्वरूप परिवहन व्यवस्था का अभाव महसूस किया गया।2 ब्रिटिश सरकार ने भारत में पक्की सड़कों का निर्माण करवाया, 1857 ई० में जिले के अधिकारियों को यथासम्भव समय से सड़क निर्माण करने के निर्देश दिये गये। ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा आगरा-अवध राज्य के विकास पर पर्याप्त ध्यान दिया। आगरा, अवध ,रूहेलखंड कुमाऊँ राज्य के उद्योगों को विकास हेतु चुना गया और इस योजना के अन्तर्गत सभी व्यापारिक केन्द्रों को सड़क व रेल मार्गो के माध्यम से जोड़ने का प्रयास किया।
भारत में रेल के निर्माण का कार्य ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे ने किया। जिसने बाम्बे, दिल्ली, सूरत, बड़ौदा, ग्वालियर, मुहु और इंदौर तक के विस्तृत भू-भाग पर रेल निर्माण का कार्य किया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में निर्मित की गयी इलाहाबाद-आगरा लाइन तथा आगरा अलीगढ़ रेल लाइन के खण्ड को तैयार किया गया । 1864 ई० तक इलाहाबाद में यमुना के पुल को छोड़कर कलकत्ता से दिल्ली तक की रेलवे लाइन को प्रारम्भ कर दिया गया। इसके साथ ही अब कलकत्ता से दिल्ली के मध्य लम्बी रेल यात्रा में मुसाफिरों को पहुँचाया और वापस लाया जा सकता था। देश के औद्योगिक विकास के लिए बुनियादी ढांचा मुख्यतः रेलों पर ही निर्भर है। रेलवे की स्थापना और उसके विस्तार के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिणाम अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहे हैं।
ब्रिटिश काल में रेलों के निर्माण और विकास का भारतीय आर्थिक जीवन पर अच्छा और बुरा दोनों तरह का प्रभाव पड़ा लेकिन कुल मिलाकर ब्रिटिश सरकार की रेलवे नीति भारत में ब्रिटिश हितों को प्राथमिकता देने की रही| रेलों के निर्माण और प्रसार से ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था का आत्म-केन्द्रित स्वभाव (अकेले अपने उपर ही निर्भर करने का स्वभाव) समाप्त हो गया। ग्रामीण क्षेत्र नगरों के सम्पर्क में आने लगे, फलस्वरूप ग्रामीण तथा शहरी अर्थ-व्यवस्था पहले की अपेक्षा अधिक निकट आई। गाँवों में शहरी वस्तुओं की उपलब्धता बढ़ने लगी और ग्रामीणों के रहन-सहन के स्तर में शहरीपन आने लगा । रेलों के विकास ने कुछ स्वस्थ सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी डाले, जाति-प्रथा के बन्धन ढीले पड़ने लगे और छुआछूत की कठोरता भी मिटने लगी। अनेक सामाजिक रुढ़ियों और पिछड़ेपन की परिस्थितियाँ कमजोर होने लगीं। अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के सदस्यों को रेलों में रोजगार मिला, फलस्वरूप उनके कल्याण में वृद्धि होने लगी। रेलों ने देश में राजनीतिक चेतना के प्रसार में योगदान दिया और राष्ट्रीय नेताओं ने देश भर में सुविधापूर्वक धूम-घूमकर राष्ट्रीयता और स्वाधीनता के विचारों का प्रसार किया ।
ब्रिटिश शासन में पुराना इम्पीरियल हाइवे जो दिल्ली को झांसी से जोड़ता था आज उसी मार्ग को आगरा मुम्बई मार्ग के नाम से जाना जाता है। दूसरा मार्ग कानपुर, इटावा, शिकोहाबाद, फिरोजाबाद, आगरा, मथुरा से दिल्ली तक जिसको वर्तमान में राष्ट्रीय राजमार्ग 2 व तीसरा मार्ग कानपुर, बेवर, भोगांव, एटा, अलीगढ़ से दिल्ली, को गया था, जिसको आज जी०टी० रोड के नाम से जाना जाता है। ब्रिटिश काल में इन सड़कों के साथ-साथ जनपद मुख्यालयों को जोड़ने के लिये रूहेलखंड के कच्चे मार्ग भी थे जिनके द्वारा आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाया जा सकता था।
यातायात नेटवर्क अंग्रेजों के शासन काल में प्रारम्भिक मेन लाइन बरेली से आँवला एवं चन्दौसी होकर मुरादाबाद तक 1873 ई० में शुरू की गई जिस पर जून 1874 में राम गंगा पुल का निर्माण हुआ। वर्तमान मेन लाइन बरेली से रामपुर होकर मुरादाबाद तक सन् 1894 में प्रारम्भ की गई। बरेली से काठगोदाम तक छोटी लाइन का प्रारम्भ 1884 में हुआ। बरेली से सोरों तक छोटी लाइन 1903 में जोड़ी गई जिस पर 1906 में यात्रा शुरू हुई। रुहेलखंड के प्राचीन एवं नवीन यातायात एवं परिवहन का वर्णन निम्नलिखित है-
प्राचीन समय में यातायात वर्तमान जैसा नहीं था। पांचाल भूमि के दो भाग होने पर यह क्षेत्र उत्तरी पांचाल भूमि में आया और अहिच्क्षेत्र यहाँ की राजधानी रही। इस काल में यह क्षेत्र पाटिलीपुत्र, वाराणसी, कौशाम्बी, मथुरा और तक्षशिला से यातायात द्वारा जुड़ा हुआ था। 1308 ई० में जब चंगेज खां के वंशजों ने भारत पर आक्रमण किये तो उन्होंने बरेली एवं हिमालय के प्रदीप प्रदेशों की यात्रा की। 17वीं एवं 18वीं शताब्दी में मुख्य रास्तों पर वृक्षों की कतारें थीं एवं कहीं-कहीं सड़कों पर दीवारें भी बनी थीं। जहाँ पर व्यापारी एवं यात्री रात्रि में विश्राम करते थे। रूहेलों के शासन काल में बरेली-सिरौली मार्ग के प्रमाण आज भी प्राप्त होते हैं तथा बरेली सम्भल मार्ग का भी प्रमाण है जिसकी शाखा बदायूँ, आँवला तथा बरेली शाहजहाँपुर मार्ग पर है।
1801 ई0 में ब्रिटिश सरकार ने बरेली को जिला बनाया तथा स्थानीय स्तर पर जमीदारों को सम्पर्क मार्ग बनवाने की कार्य योजना सौंप् गया लेकिन यह कार्य असन्तोषजनक था। तब रास्तों पर कर लगाया गया। इसके लिए रोड एण्ड फेरी फण्ड कमेटी प्रशासनिक दृष्टि से बनायी गयी। 1879 ई० में बरेली मुरादाबाद रोड की को आगे बढ़ाया गया जो मीरगंज के उत्तर पश्चिम भाग से होती हुई बरेली- बदायूँ रोड तक गया।
यातायात के विभिन्न साधनों में सड़कों, रेलों, आन्तरिक जल मार्गों और वायुयान मार्गों का महत्व बहुत अधिक है।3 ऊधम सिंह नगर में परिवहन के साधनों का विकास स्वतन्त्रता के पश्चात् प्रारम्भ हुआ। 1939-45 में यहाँ प्रथम मोटर मार्ग रूद्रपुर-रामपुर के बीच बना था। तराई और भावर क्षेत्र का मैदानी क्षेत्रों से रेल सम्पर्क ब्रिटिश काल में हो गया था, जब अवध तिरहुत रेल सर्वप्रथम लखनऊ से काठगोदाम के बीच चली थी। नैनीताल की तराई और भावर क्षेत्र का मैदानी क्षेत्रों से रेल सम्पर्क ब्रिटिश शासन काल में वर्ष 1884 में हो गया था।
1884 के बाद लालकुआँ काशीपुर और मुरादाबाद-काशीपुर के बीच रेल सम्पर्क हुआ। इसके बाद भारतीय रेलवे बोर्ड ने चन्दौसी-लालकुआँ वाया रामपुर-रूद्रपुर के मध्य रेल लाइन बिछाने व गाडी चलाने का प्रोजेक्ट तैयार किया परन्तु उसे स्वीकृति नहीं मिल पायी। परन्तु इस क्षेत्र में औद्योगिक, व्यापारिक व कृषि क्षेत्र में विकास हो जाने के कारण इस मार्ग के लिए यहाँ की जनता द्वारा माँग उठायी गयी, जिसे स्वीकार कर लिया गया तथा इस लाइन पर कार्य प्रारम्भ कराया गया।
जलमार्गों का भी उचित विकास किया गया| 1906 में यहां कई छोटे जल सम्पर्क मार्ग थे जोकि पुलों के निर्माण के साथ-साथ कम होते गये। परिवहन के संचालन से पहले इस क्षेत्र में यात्रा करना दुष्कर था लेकिन 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही यहां सरकार द्वारा सम्पर्क मार्गों का निर्माण शुरु हो गया और यन्त्र चालित वाहन अस्तित्व में आ गये।4 सल्तनत काल में अमरोहा एवं सम्भल प्रमुख पड़ाव थे। सम्भल में तो 52 सराय भी थे जो कटेहर एवं अवध सम्पर्क मार्ग पर स्थित थे।
प्राचीन समय में निश्चित रुप से गंगा का उपयोग जल सम्पर्क मार्ग के रूप में होता था। मध्ययुगीन भारत में प्रमुख सम्पर्क मार्गों के किनारे वृक्ष होते थे जिनके नीचे यात्री रुक कर विश्राम करता था। दिल्ली से एक सड़क गंगा पार करती हुई टिहरी से निकलती हुई अमरोहा होकर मुरादाबाद जाती थी। यह सम्पर्क मार्ग इस जनपद के मुंडा पान्डे नामक स्थान पर से बनारस होते हुए पटना तक गया था। एक दूसरी सड़क दिल्ली से शुरू होकर सम्मल होते हुये चन्दौसी और चन्दौसी से बरेली एवं अनूपशहर तक जाती थी। ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत मुरादाबाद-नैनीताल राजमार्ग, मुरादाबाद रामनगर राजमार्ग के अतिरिक्त 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक यहाँ कई राजमार्ग विकसित हो चुके थे।
1872 में अवध रुहेलखण्ड रेलवे लाईन की स्थापना के साथ-साथ मुरादाबाद रेलवे का श्रीगणेश हुआ। यह रेलवे लाइन अलीगढ़,मुरादाबाद व चन्दौसी-बरेली के बीच एक सम्पर्क पथ का काम करती थी। 1873 में मुरादाबाद से बनारस के मध्य रेल पथ चालू हुआ। उस समय पांच रेलवे स्टेशन बहजोई, चन्दौसी, बिलारी, कुन्डारकी और मुरादाबाद थे। 1884 में उत्तरी मुख्य रेल पथ नगीना तक बढ़ाया गया, फिर सहारनपुर तक। 1894 में बरेली से रामपुर और मुरादाबाद तक रेल पथ का निर्माण किया गया।
1900 में एक उपरेल पथ मुरादाबाद से गजरौला तक शुरू किया गया। 1943 में अवध-रुहेलखण्ड रेल पथ की स्थापना की गयी जो मुरादाबाद को काशीपुर से जोड़ती थी, 1952 में यही रेल पथ उत्तरपूर्वी रेलवे के रूप में विकसित हुआ। इन रेल पथों पर मालगाड़ियों का संचालन भी शुरू हुआ। जिससे धातुओं, कपड़ों, साइकिलों आदि का व्यापार आसान हो गया।जल मागों का यहां कभी व्यापक रूप से प्रयोग नहीं हुआ। 1894 में सबसे लम्बा पुल रामगंगा पर बना|
रामपुर क्षेत्र हस्तिनापुर एवं अहिछत्र के मध्य राजमार्ग पर पड़ता था। 1801 में ब्रिटिश शासन के समय भी यहाँ संम्पर्क मार्ग बनाये गये थे जोकि रामपुर को मुरादाबाद एवं बरेली से जोड़ते थे। यहाँ से राष्ट्रीय राज्यमार्ग 24 निकलता है जो मुरादाबाद बरेली-दिल्ली तक जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य महत्वपूर्ण राजमार्ग रामपुर मुख्यालय होते हुये शाहबाद तक, शाहबाद से महापुरी होते हुये बिलारी तक, रामपुर मुख्यालय से बिलासपुर होते हुये किच्छा तक तथा बिलासपुर केमरी राजपुर होते हुये मिलक तथा अन्य मुख्य राजमार्ग तक जाते है। अन्य सम्पर्क मार्ग जो बरेली व मुरादाबाद को जोड़ते हैं सामान्यतः रामपुर से होकर गुजरते हैं। चूंकि रामपुर दो बड़े जनपदों के मध्य स्थित है इसलिये यह संम्पर्क मार्ग अच्छी दशा में है। इसके अतिरिक्त जिला परिषद के द्वारा भी कई अन्य संम्पर्क मार्ग विकसित किये जा चुके थे। 1894 में बरेली-रामपुर, मुरादाबाद रेल पथ का निर्माण किया गया था।
परिवहन तंत्र विविध प्रकार के परिवहन माध्यमों का, जो परस्पर प्रतिस्पर्धात्मक एवं परिपूरक हो सकते हैं, समुच्चय होता है।5 परिवहन एवं संचार को एक शब्दावली में परिसंचरण की संज्ञा दी जाती है। वस्तुओं या व्यक्तियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर आवागमन को परिवहन करते हैं, जबकि सन्देश विचार आदि के प्रादेशिक आदान-प्रदान को संचार कहते हैं। परिवहन उत्पादन का महत्वपूर्ण अंग है।
रूहेलखंड क्षेत्र की नगीना तहसील में परिवहन तन्त्र एवं संचार के साधन किसी भी प्रकार के अव्यावसायिक, आर्थिक, सांस्कृतिक विकास अथवा भूविन्यास समायोजन के लिए अनिवार्य तत्त्व हैं परन्तु मात्र परिवहन सुविधा उपलब्ध इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु पर्याप्त नहीं है।6 आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास एवं समायोजन के लिए परिवहन साधनों के साथ ही साथ संसाधन एवं पूंजी की उपलब्धता, तकनीकी क्षमता, शिक्षा एवं प्रशिक्षण, कुशल नेतृत्व आदि कई तत्व अपेक्षित हैं
सन्दर्भ ग्रन्थ
- जहांगीर सिंह जयन्त, विकास के नये चरण-भारत के पत्तनों की बढ़ती यातायात क्षमता, योजना, 16-30, सितम्बर, 1982, pg18
- प्रमोद कुमार सिंह एवं हौशिला प्रसाद, परिवहन तंत्र की कृषि विकास में भूमिका : वाराणसी जनपद (उ०प्र०) का एक प्रतीक अध्ययन, उत्तर भारत भूगोल पत्रिका, अंक 31. संख्या 1, जून, 1995,pg37
- दिलीप कुमार श्रीवास्तव एवं गिरिजेश लाल श्रीवास्तव, समन्वित ग्रामीण विकास में परिवहन एवं संचार सुविधाओं की भूमिका उत्तर भारत भूगोल पत्रिका, अंक 29, 1993pg55
- दीक्षा बिष्ट, एक ऐतिहासिक रेल यात्रा रेलों के संग्रहालयों में विज्ञान प्रगति नवम्बर, 1991,pg60
- दामोदर दासमंदूड़ा , भारतीय जहाजरानी उपलब्धियों तथा समस्यायें, योजना, 1-15, अक्टूबर, 1990, विकास में ग्रामीण सड़कों का महत्व, कुरुक्षेत्र, अगस्त 1993 pg45,
- पुष्पा पंत ,नैनीताल तथा इसके समीपवर्ती पर्यटन क्षेत्र में पर्यटक यातायात के स्वरूप का भौगोलिक पक्ष, उत्तर प्रदेश भूगोल पत्रिका, अंक, 27, संख्या 1-2, जून-दिस० 1991,pg30





